कुम्भ एक व्यापर है
ये विश्व मेला ये नगरी है
गंगा यमुना सरस्वतीं की आवरल धारा की , ये है तीर्थराज है प्रयागराज
कुछ मानता के अनुसार अमृत का अन्शय है यहाँ जहाँ अमृत है वहाँ इश्वर
भगवान अल्लाह रहते है
जहाँ ज भगवन अल्लाह है वहाँ उनके भक्त जायेगे
मुख्य बात क्या यहाँ धर्म है
या फिर धन सरकार हो या संत सभी यहाँ धन लुटते है
सरकार अपने वर्चास्व के लिये धन लुटती है सन्त अपना धन यश के लिए
लुटती है
व्यापर का मतलब है कुछ खरीद विक्री = कुछ लाभ हानि
यहाँ पर कुछ धर्म कमाने आते है कुछ धन कमाने है कुभ्म एक व्यापर है
लाभ हानि तो बाद की बात है
कुछ यहाँ काम करते है वोट के लिए , कुछ यहाँ काम करते है नोट के
लिए इसके मद में कुछ यश है कुछ वय्भव कुछ
सामान है
मेरे लिए तो मेला का मतलब है आय आय का सव्रोत अलग अलग है किसी के इज्जत किसी के सामान है किसी किसी
को मुद्र
मेला का प्रचीन में हर एक तफ्का के लिए भला हो , छोटे छोटे व्यापारी के लिए एक से दो माह शरीर
तोड़ कर मेहनत है और सालो साल भर का आराम
है वाही संत के लिए सालो साल के मेहनत कुछ
दिन के लिए आराम है
इसी बीच एक रास्ता है सामज के सामाजिक कार्यकार्ता (नेता ,समाज
के ठेकेदार या समाज के चिन्तक) के लिए फसल कटाई मतलब ( मेले में आये नागरिक का श्नेहय
लेने ) का !
इस मेला में कोई वोट बेच रहा है ,कोई योग बेच रहा है , कोई संस्कार
बेच रहा है सभी अपनी अपनी सामान बेच रहा
है ,
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चलो अच्छा हुआ ये व्यापर मेला में कुछ कुछ श्रीराम जी का दरवाजा खुला
.
शेष मेला के बाद





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